बी.ए. पास: फिल्म समीक्षा

बैनर : टोंगा टॉकीज
निर्माता : अजय बहल
निर्देशक : अजय बहल
कलाकार : शिल्पा शुक्ला, राजेश शर्मा, दिव्येंदु भट्टाचार्य, दीप्ति नवल

समाज जैसा दिखता है वैसा होता नहीं है। बंद दरवाजे के पीछे शराफत के नकाब उतर जाते हैं और तमाम नैतिकता और मूल्य धराशायी हो जाते हैं। निर्देशक अजय बहल ने फिल्म ‘बी.ए. पास’ के जरिये इसी समाज की पड़ताल की है। सेक्स और अपराध के तड़के के साथ उन्होंने अपनी बात एक थ्रिलर मूवी की तरह पेश की है।

फिल्म का नायक मुकेश (शादाब कमल) बीए फर्स्ट ईयर का स्टूडेंट है। बीए करना उसकी मजबूरी है क्योंकि वह इतने नंबर नहीं ला सका है कि बढ़िया कोर्स कर सके। अपने माता-पिता को खो चुका है। बुआ के घर ताने सुनते हुए रहता है। इतना पैसा भी नहीं है कि मनचाहा कोर्स कर सके। दो छोटी बहनों की जिम्मेदारी भी उस पर है।

मुकेश उन करोड़ों भारतीय युवाओं का प्रतिनिधित्व करता है जो हर बात में औसत से भी नीचे हैं और दर-दर की ठोकरें खाना उनकी नियति है। उनकी मजबूरी का फायदा उठाते हुए रसूखदार लोग उनका शोषण करते हैं।

मुकेश के फुफा के बॉस की पत्नी सारिका (शिल्पा) की नजर मुकेश पर है। बॉस की पत्नी घर का काम करवाने के लिए मुकेश को बुलवाती है। बॉस को खुश करने के लिए भेजा जाता है। सारिका उन गृहिणियों का प्रतिनिधित्व करती है जिनके पतियों को पैसा कमाने से फुर्सत नहीं है। रोमांस और सेक्स तो दूर की बात है।

डरा और सहमा हुआ मुकेश अपनी आंटी की उम्र की सारिका के जाल में उलझ जाता है। सेक्स के साथ उसे पैसा मिलता है, लेकिन वह इस बात से अनजान है कि वह दलदल में फंसता जा रहा है। कब वह जिगेलो (पुरुष वेश्या) बन जाता है उसे पता ही नहीं चलता। फिल्म के अंत में दर्शाया गया है कि गलत राह पर चलने का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता।

वास्तविकता की जमीन इतनी सख्त होती है कि विश्वास और प्यार की बातें इससे टकराकर चकनाचूर हो जाती है। इसको दो प्रसंगों से रेखांकित किया गया है। जानी भाई मुकेश का दोस्त है, जो शतरंज के खेल में माहिर है। मुकेश को भी शतरंज का शौक है। कारपोव और कास्पारोव के दीवाने आपस में खेलते हैं, लेकिन जिंदगी की शतरंज में जानी भाई ऐसा दांव चलता है कि मुकेश चारो खाने चित्त हो जाता है। पैसा आने पर व्यक्ति की सोच और समझ किस तरह यू टर्न लेती है, ये जानी भाई के किरदार से समझा जा सकता है। दीप्ति नवल का पति सालों से कोमा में है। तनहाई का दर्द उससे बर्दाश्त नहीं होता है और वह चाहती है कि उसका पति मर जाए। रोजाना के संघर्ष से उसका प्यार हार जाता है। इन किरदारों के जरिये ‘बीए पास’ में हमें जिंदगी के रंग देखने को मिलते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये सारी बातें अब तक परदे पर दिखाई नहीं गई है, लेकिन निर्देशक अजय ने मोहन सिक्का द्वारा लिखी गई गई कहानी ‘रेलवे आंटी’ को परदे पर अच्छे से उभारा है। नई दिल्ली में उन्होंने कहानी को सेट किया और उनके द्वारा चुने गए लोकेशंस सराहनीय है।

अजय ने अपने निर्देशन में उतनी आक्रामकता नहीं दिखाई जितनी कहानी की डिमांड थी। सेक्सी दृश्यों को उन्होंने बखूबी शू‍ट किया, लेकिन उनमें दोहराव नजर आया। फिल्म के शुरुआती हिस्से में भी यदि घटनाक्रमों में तेजी दिखाई जाती तो यह फिल्म और बेहतर होती।

मासूम और संकोची मुकेश को शादाब कमल ने बेहतरीन तरीके से अभिनीत किया। राजेश शर्मा, दीप्ति नवल और दिव्येन्दु भट्टाचार्य ने अच्छा सहयोग दिया। लेकिन शिल्पा शुक्ला पूरी फिल्म में छाई रही। कामुक, कुटील और कुंठित महिला को उन्होंने बखूबी जिया।

डार्क सिनेमा के शौकीनों को ‘बीए पास’ पसंद आएगी।

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डरा और सहमा हुआ मुकेश अपनी आंटी की उम्र की सारिका के जाल में उलझ जाता है। सेक्स के साथ उसे पैसा मिलता है, लेकिन वह इस बात से अनजान है कि वह दलदल में फंसता जा रहा है। कब वह जिगेलो (पुरुष वेश्या) बन जाता है उसे पता ही नहीं चलता। फिल्म के अंत में दर्शाया गया है कि गलत राह पर चलने का अंजाम कभी अच्छा नहीं होता।

वास्तविकता की जमीन इतनी सख्त होती है कि विश्वास और प्यार की बातें इससे टकराकर चकनाचूर हो जाती है। इसको दो प्रसंगों से रेखांकित किया गया है। जानी भाई मुकेश का दोस्त है, जो शतरंज के खेल में माहिर है। मुकेश को भी शतरंज का शौक है। कारपोव और कास्पारोव के दीवाने आपस में खेलते हैं, लेकिन जिंदगी की शतरंज में जानी भाई ऐसा दांव चलता है कि मुकेश चारो खाने चित्त हो जाता है। पैसा आने पर व्यक्ति की सोच और समझ किस तरह यू टर्न लेती है, ये जानी भाई के किरदार से समझा जा सकता है। दीप्ति नवल का पति सालों से कोमा में है। तनहाई का दर्द उससे बर्दाश्त नहीं होता है और वह चाहती है कि उसका पति मर जाए। रोजाना के संघर्ष से उसका प्यार हार जाता है। इन किरदारों के जरिये ‘बीए पास’ में हमें जिंदगी के रंग देखने को मिलते हैं।

ऐसा नहीं है कि ये सारी बातें अब तक परदे पर दिखाई नहीं गई है, लेकिन निर्देशक अजय ने मोहन सिक्का द्वारा लिखी गई गई कहानी ‘रेलवे आंटी’ को परदे पर अच्छे से उभारा है। नई दिल्ली में उन्होंने कहानी को सेट किया और उनके द्वारा चुने गए लोकेशंस सराहनीय है।

अजय ने अपने निर्देशन में उतनी आक्रामकता नहीं दिखाई जितनी कहानी की डिमांड थी। सेक्सी दृश्यों को उन्होंने बखूबी शू‍ट किया, लेकिन उनमें दोहराव नजर आया। फिल्म के शुरुआती हिस्से में भी यदि घटनाक्रमों में तेजी दिखाई जाती तो यह फिल्म और बेहतर होती।

मासूम और संकोची मुकेश को शादाब कमल ने बेहतरीन तरीके से अभिनीत किया। राजेश शर्मा, दीप्ति नवल और दिव्येन्दु भट्टाचार्य ने अच्छा सहयोग दिया। लेकिन शिल्पा शुक्ला पूरी फिल्म में छाई रही। कामुक, कुटील और कुंठित महिला को उन्होंने बखूबी जिया।

डार्क सिनेमा के शौकीनों को ‘बीए पास’ पसंद आएगी।

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