फिल्‍म समीक्षा : फिकर नॉट, ‘बॉस’ है

सितारे: अक्षय कुमार, रोनित राय, डैनी, मिथुन चक्रवर्ती, अदिति राव हैदरी, शिव पंडित, जॉनी लीवर
निर्देशक: एंथनी डिसूजा
निर्माता: अश्विन वर्दे
संगीत: मीत ब्रदर्स अंजान, यो यो हनी सिंह, चिरंतन भट्ट, पी.ए. दीपक
गीत: कुमार, मनोज यादव, साहित कौशल-लिटिल गोलू लेखन-पटकथा-संवाद : साजिद-फरहाद
बैनर: वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स

हमारी फिल्में अक्सर ऑस्कर की रेस से बाहर हो जाती हैं। इसके कई कारण हैं, जिनका इस फिल्म की समीक्षा से कुछ खास लेना-देना तो नहीं है, लेकिन एक बड़ा कारण ये भी सामने आता है कि हम बॉलीवुड फॉर्मूलों से लबरेज फिल्मों में लाख कोशिशों के बावजूद नयापन नहीं ला पा रहे हैं। पिछले कुछ सालों में दक्षिण भारतीय फिल्मों के रीमेक के रूप में वांटेड, सिंघम, रेडी, बॉडीगार्ड, राउडी राठौड़ सरीखी हिट-सुपरहिट हुई फिल्में इसका एक बड़ा उदाहरण हैं।

अक्षय कुमार की फिल्म ‘बॉस’ भी इसी लीग की फिल्म है, जो 2010 की हिट मलयालम फिल्म ‘पोक्किरी राजा’ का रीमेक है। फिल्म की कहानी 80-90 के दशक की हिन्दी फिल्मों की याद दिलाती है। एक अत्याचारी इंस्पेक्टर है एसीपी आयुष्मान (रोनित राय), जो पुलिस की कम और एक भ्रष्ट मंत्री (गोविंद नामदेव) की नौकरी ज्यादा बजाता है। एक गांधीवादी विचारधारा वाला  पिता है सत्यकांत शास्त्री (मिथुन चक्रवर्ती) और उसका एक लक्ष्मण जैसा बेटा है शिव (शिव पंडित)। दूसरा बेटा है सूर्या उर्फ बॉस (अक्षय कुमार) जो गरीबों का मसीहा होने के साथ-साथ दरियादिल गुंडा भी है, जिसे एक और बड़े गुंडे यानी बिग बॉस (डैनी) ने पाला-पोसा है।

कहानी में ट्विस्ट तब आता है, जब आयुष्मान को पता चलता है कि शिव उसकी बहन अंकिता (अदिति राव हैदरी) से प्यार करने लगा है। आयुष्मान अंकिता की शादी मंत्री के बेटे से करना चाहता है, इसलिए वह शिव को एक झूठे इल्जाम में जेल में ठूंस देता है, जिसे छुड़वाने की जिम्मेदारी लेता है बॉस।

अब ये इतनी-सी कहानी ढाई घंटे तक कैसे खिंचेगी! फिकर नॉट, बॉस है ना! और बॉस है तो फॉर्मूलों की कोई कमी नहीं होगी। फिल्म की शुरुआत में ग्लैमरस और सुरीला पंच दिया है बिकिनी पहने अदिति राव हैदरी ने, जो शिव पंडित के साथ फिल्म जांबाज के हिट गीत ‘हर किसी को नहीं मिलता यहां प्यार जिंदगी में..’ पर ठुमके लगाती दिखती हैं। ऐसे ही पंच फिल्म के टाइटल ट्रैक बॉस.. और पार्टी ऑल नाइट..में भी देखने को मिलते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि फिल्म के ये तीन गीत बांधे रखते हैं। इनमें एक तरह का नयापन भी है और युवाओं को लुभाने वाली अपील भी। लेकिन फिल्म के बाकी हिस्से पुराने और घिटे-पिटे लगते हैं, जिसके पीछे कमजोर पटकथा का हाथ है।

फिल्म का एक गीत पिता से है नाम तेरा.. में शब्द अच्छे पिरोये गये हैं, लेकिन जिन हिस्सों के साथ इसे सजाया गया है, उनमें ड्रामे का स्तर इतना ऊंचा है कि कई बार हंसी-सी छूट जाती है। खासतौर से फिल्म के क्लाईमैक्स में, जब मिथुन चक्रवर्ती आईसीयू से उठ सीधे रणभूमि में पहुंच जाते हैं, जहां बॉस आयुष्मान को घूंसे मार मार कर जमीन में गाड़ चुका है। अब बात कॉमेडी की। फिल्म में बॉस हैं तो फिल्म में बेशक जॉनी लीवर, संजय मिश्र और शक्ति कपूर जैसे कलाकार ही क्यों न हों, वो आजू-बाजू ही खड़े रहेंगे। इसलिए कॉमेडी भी बॉस के दायरे में ही सिमट कर रह गयी है।

फिल्म में एक्शन जबरदस्त है। कई बार अचरज भी होता है कि चालीस पार कर चुके अक्षय इमारतों पर मेंढक की तरह फुदक फुदक कर गुंडों को कैसे छकाते हैं। बेशक ये सारा एक्शन स्पेशल इफेक्ट्स की कृपा पर टिका है, लेकिन भाता है। अक्षय के कुछ खास स्टाइल हैं, जो फिल्म के कई हिस्सों में बांधे रखते हैं। वो अच्छे भी लगते हैं, पर मन में ख्याल आता है कि उन्होंने हरियाणवी की टांग क्यों तोड़ी! शुद्ध भाषा में कहें तो ‘बॉस’ शुद्ध फिल्मी फॉर्मूलों के मसालों से बनी एक ऐसी रेसिपी की तरह है, जिसे हर रेस्तरां अपने-अपने ढंग से बना और परोस सकता है। जिनके लिए हर हफ्ते फिल्म देखना एक मजबूरी है, वे ‘बॉस’ जरूर देखें। वर्ना फिल्मों के मामले में आज हर कोई अपना खुद का बॉस है बॉस!

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फिल्म का एक गीत पिता से है नाम तेरा.. में शब्द अच्छे पिरोये गये हैं, लेकिन जिन हिस्सों के साथ इसे सजाया गया है, उनमें ड्रामे का स्तर इतना ऊंचा है कि कई बार हंसी-सी छूट जाती है। खासतौर से फिल्म के क्लाईमैक्स में, जब मिथुन चक्रवर्ती आईसीयू से उठ सीधे रणभूमि में पहुंच जाते हैं, जहां बॉस आयुष्मान को घूंसे मार मार कर जमीन में गाड़ चुका है। अब बात कॉमेडी की। फिल्म में बॉस हैं तो फिल्म में बेशक जॉनी लीवर, संजय मिश्र और शक्ति कपूर जैसे कलाकार ही क्यों न हों, वो आजू-बाजू ही खड़े रहेंगे। इसलिए कॉमेडी भी बॉस के दायरे में ही सिमट कर रह गयी है।

फिल्म में एक्शन जबरदस्त है। कई बार अचरज भी होता है कि चालीस पार कर चुके अक्षय इमारतों पर मेंढक की तरह फुदक फुदक कर गुंडों को कैसे छकाते हैं। बेशक ये सारा एक्शन स्पेशल इफेक्ट्स की कृपा पर टिका है, लेकिन भाता है। अक्षय के कुछ खास स्टाइल हैं, जो फिल्म के कई हिस्सों में बांधे रखते हैं। वो अच्छे भी लगते हैं, पर मन में ख्याल आता है कि उन्होंने हरियाणवी की टांग क्यों तोड़ी! शुद्ध भाषा में कहें तो ‘बॉस’ शुद्ध फिल्मी फॉर्मूलों के मसालों से बनी एक ऐसी रेसिपी की तरह है, जिसे हर रेस्तरां अपने-अपने ढंग से बना और परोस सकता है। जिनके लिए हर हफ्ते फिल्म देखना एक मजबूरी है, वे ‘बॉस’ जरूर देखें। वर्ना फिल्मों के मामले में आज हर कोई अपना खुद का बॉस है बॉस!

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