पहले कामेड़ी फिल्म का हिस्सा होती थी, आज कामेड़ी जबरन थोपी हुई होती है – सी. पी. भट्ट

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किसी को हँसाना, दुनिया की सबसे कठिन कला है। कहते है रुला तो कोई भी सकता है किन्तु हँसाना और वह भी विपरीत परिस्थितियों में कितना कठिन होता है यह तो कोई भी स्वः राजकपूर साहब की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ देखकर सहज ही अनुमान लगा सकता है । सहजनवा, गोरखपुर (उ.प्र.) स्थित ग्राम पुण्डा निवासी हास्य कलाकार के सी. पी. भट्ट ने इसी असाध्य को साधने का जिम्मा लिया है। प्रस्तुत है, हास्य कलाकार सी. पी. भट्ट से पत्रकार रविशंकर द्वारा लिए गए साक्षातकार के अंश –
भट्ट जी! आपने अभिनय की शिक्षा-दीक्षा कहाँ से ली ?

मेरे पिता जी, अपने जमाने के बहुत अच्छे रंगकर्मी रहे। आप कह सकते हैं, अभिनय मुझे विरासत में मिली है। कोई शक नही है कि मेरे पिता ही, मेरे गुरु रहे।
बतौर अभिनेता आपने कौन कौन से सीरियल किए ?
मैने अब तक भोजपुरी सीरियल ‘बड़की मलकाइन’, ‘बड़का साहब’ एवं हिन्दी में ‘चिडि़याघर’, ‘लापतागंज’, ‘हम आप इनलाज’, ‘न आना इस देश में लाड़ो’ आदि कई दर्जनों सीरियल किए।
आपने फिल्मों में एक्टिंग की शुरुआत किस फिल्म से की ?
निर्देशक बालकिशन सिंह की फिल्म, ‘पिया तोहसे नैना लागे’ से मैने फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की। ‘कहाँ जइबऽ राजा नजरिया लडाई के’ दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ द्वारा अभिनीत गोल्डे़न जुबली फिल्म रही। इसके बाद ‘साजन चले ससुराल’, ‘भइया के साली ओढ़निया वाली’, ‘रंगबाज’, निर्देशक राजकुमार आर पाण्डेय की ‘नागिन’ की। ‘दुल्हेराजा’, ‘भाईजी’, ‘कालिया’, ‘रिहाई’, ‘लागल रहऽ राजा जी’, ‘चरणों की सौगन्ध’, ‘रिहाई’, ‘गंगा जमुना सरस्वती’ आदि अनेकों फिल्मों में मैने काम किया।
आपको कई एवार्ड भी मिल चुके है, उनके बारे मे कुछ बताएं ?
मुझे 2001 में नेशनल लेवल ड्रामा कम्पटीशन में, ‘बेस्ट एक्टर’ 2012 में ‘सितारे अवध’ एवं ‘भिखारी ठाकुर’ सम्मान मिला और इस वर्ष 2014 मे ‘बेस्ट कामेडि़यन’ का एवार्ड मिला है।
क्या आपनें ने हिन्दी फिल्में भी की हैं ?
हाँ ‘ई. एम. आई’, ‘कूल नही हाट हैं हम’, ‘हाल-ए-दिल’ आदि फिल्में आ चुकी हैं। अब ‘ग्लोबल बाबा’, ‘मुम्बई रीयल स्टोरी’ के साथ-2 मै मुख्य किरदार में ‘हंटिंग इन एम. पी.’, ‘शैतान’ आदि 3 ड़ी फिल्में और ‘अतरंगी-स्ट्रगल के माँ की आँख’ में काम कर चुका हँू। ये सभी फिल्में निकट भविष्य में आने वाली हैं।
भट्ट जी! आपको क्या लगता है, आजकल भोजपुरी फिल्मों में मेकिंग के तौर पर कैसा काम चल रहा है ?
आजकल फिल्मों में जड़ से जुड़ कर कुछ भी नही हो रहा है। भोजपुरी में तो बिल्कुल भी नही। यही वजह है कि, हमें वैसी फिल्में देखने को नही मिल रही हैं, जैसे फिल्में बननी चाहिए। हमें भोजपुरी के मामले में अब गम्भीर हो जाना चाहिए।
आपको फिल्मों में हँसाने का काम करते हुए कैसा लगता है ?
अगर मुझे या मेरे अभिनय को देखकर किसी को खुशी मिलती है, तो सच मानिए रवि जी! खुशी मुझे सबसे अधिक होती है। फिल्म में कामेड़ी का महत्वपूर्ण स्थान है। आज की टेन्शन भरी दुनिया में, हल्की-फुल्की कामेड़ी बहुत जरुरी है। मुझे शेक्सपियर की एक पंक्ति याद आ रही है, ‘ट्रेजड़ी इज ए कामेड़ी’।
पहले की और आज की फिल्मों में कमेडि़यन के स्तर में क्या अन्तर आया है ?
पहले कामेड़ी फिल्म का हिस्सा होती थी, आज कामेड़ी जबरन थोपी हुई होती है। ठीक उसी तरह से पहले के कमेडि़यन, फिल्म की मुख्य धारा से जुड़े हुए होते थे।
फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता के लिए आप किसे दोषी मानते हैं ?
शायद खुद को भी। अगर हम अश्लीलता का परहेज करें तो कोई ताकत नही है जो हमसे अश्लील दृश्य या संवाद बोलने के लिए मजबूर करे। हम कभी स्वेच्छा से ऐसा नही करते। मुझे भी काम करना है, मार्केट में रहना है। मैं मानता हँू धंधा कभी गंदा नही होता है।
सुना है आपने खलनायक के रुप मे भी फिल्मों मे काम किया है ?
यह सच है मैनें खलनायक के रुप में ‘यादव जी’, रानी बनी ज्वाला’, बहुरानी में ‘करेप्ट इंसपेक्टर’ आदि किया। ‘गरदा’ में मेरी किन्नर की भूमिका जो खलनायक भी है, के काम को काफी सराहा गया। मुख्य विलेन के रुप में मेरी फिल्म ‘इन्तकाम’ की शूटिंग मिर्जापुर में होने जा रही है। इसके निर्देशक बालकिशन सिंह हैं, जिनकी फिल्म से मेरे अभिनय कैरियर की शुरुआत हुई।
हास्य और खल चरित्रों को निभाते सी. पी. भट्ट के जीवन का कोई कटु सत्य ?
कल तक आप जिस सी. पी. भट्ट को आप एक आम आदमी के रुप में जानते थे, आज उनको, उनके अभिनय और व्यक्तित्व के आधार पर उनकी पहचान है। आज व्यक्ति नही, व्यक्तित्व बड़ा हो गया है।
चलते चलते आप अपने पाठकों दर्शकों से क्या कहना चाहेगें ?
यही कि अश्लीलता दूर करने में आप हमारी मदद कीजिए। फिल्में सबसे पहले मनोरंजन का साधन, तत्पश्चात समाज की मार्गदर्शक होती हैं। अभी दोषारोपण समाज मेकरों पर तो मेकर समाज पर लगा रहा है और इसी दौरान अश्लीलता की गाड़ी हर सिग्नल तोड़ते हुए आगे निकल रही है। और हम आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हैं। दोनो को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए इससे रोकना होगा।

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किसी को हँसाना, दुनिया की सबसे कठिन कला है। कहते है रुला तो कोई भी सकता है किन्तु हँसाना और वह भी विपरीत परिस्थितियों में कितना कठिन होता है यह तो कोई भी स्वः राजकपूर साहब की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ देखकर सहज ही अनुमान लगा सकता है । सहजनवा, गोरखपुर (उ.प्र.) स्थित ग्राम पुण्डा निवासी हास्य कलाकार के सी. पी. भट्ट ने इसी असाध्य को साधने का जिम्मा लिया है। प्रस्तुत है, हास्य कलाकार सी. पी. भट्ट से पत्रकार रविशंकर द्वारा लिए गए साक्षातकार के अंश –
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मेरे पिता जी, अपने जमाने के बहुत अच्छे रंगकर्मी रहे। आप कह सकते हैं, अभिनय मुझे विरासत में मिली है। कोई शक नही है कि मेरे पिता ही, मेरे गुरु रहे।
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आपने फिल्मों में एक्टिंग की शुरुआत किस फिल्म से की ?
निर्देशक बालकिशन सिंह की फिल्म, ‘पिया तोहसे नैना लागे’ से मैने फिल्मों में अभिनय की शुरुआत की। ‘कहाँ जइबऽ राजा नजरिया लडाई के’ दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ द्वारा अभिनीत गोल्डे़न जुबली फिल्म रही। इसके बाद ‘साजन चले ससुराल’, ‘भइया के साली ओढ़निया वाली’, ‘रंगबाज’, निर्देशक राजकुमार आर पाण्डेय की ‘नागिन’ की। ‘दुल्हेराजा’, ‘भाईजी’, ‘कालिया’, ‘रिहाई’, ‘लागल रहऽ राजा जी’, ‘चरणों की सौगन्ध’, ‘रिहाई’, ‘गंगा जमुना सरस्वती’ आदि अनेकों फिल्मों में मैने काम किया।
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हास्य और खल चरित्रों को निभाते सी. पी. भट्ट के जीवन का कोई कटु सत्य ?
कल तक आप जिस सी. पी. भट्ट को आप एक आम आदमी के रुप में जानते थे, आज उनको, उनके अभिनय और व्यक्तित्व के आधार पर उनकी पहचान है। आज व्यक्ति नही, व्यक्तित्व बड़ा हो गया है।
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